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पुरानी परम्पराओं में छुपा आधुनिक ज्ञान


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इस किताब के द्वारा यह कोशिश की गयी है कि हम सब यह जान पायें कि नवरात्रि क्यों मनाते हैं और माँ अपने इन नौ रूपों द्वारा कैसे हम सब को नौ चक्रों से अवगत कराती हैं| 

माँ का हर रूप एक दूसरे से एक दम अलग है, किसी में दो हाथ हैं, किसी में चार हाथ हैं, किसी में आठ हाथ तो किसी में दस हाथ हैं, और वह भी एकदम अलग - अलग मुद्रा में, विभिन्न प्रकार की चीज़ें पकड़े जैसे ,कमल का फूल, ब्रह्म ज्योति ,रुद्राक्ष की माला, अमृत का कलश, शंख ,जल से भरा कमंडल | तरह-तरह के अस्त्र शस्त्र जैसे तीर, धनुष, त्रिशूल, गदा, तलवार, सुदर्शन चक्र एवं खड्ग | कहीं वह नंगे पाँव जमीन पर खड़ी हैं तो कहीं पर भिन्न -भिन्न प्रकार की सवारियों पर बैठी हैं जैसे बैल , शेर ,चीते , और कहीं तेज़ रफ्तार में भागते हुए गधे पर सवार हैं, वह भी एकदम काले रंग व बिखरे बाल में यानी बड़े ही विचित्र से रूप में | 

यह मेरे दिल और दिमाग की गहराइयों से किया हुआ एक ऐसा प्रयास है जो कि मैं चाहती हूँ कि आप सब भी इसको जान पायें, कि नवरात्री में माँ के इन नौ रूपों की विभिन्न मुद्राओं के पीछे ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण ज्ञान छुपा है जो माँ हम सब को नवरात्री के बहाने बताना चाहती है व कैसे वह अपने इन नौ रूपों के विशेष क्रम द्वारा नौ चक्रों से अवगत करा रही हैं, जिससे कि हम जान पायेंगे कि हमारे शरीर व हमारी आत्मा पर इसका क्या और कैसे असर पड़ता है ? 

आज का युग एक आधुनिक युग है, इस युग में बच्चे क्या बड़े भी जब तक हर चीज़ की पूरी तरह से जानकारी न प्राप्त कर लें, व उनके तर्क (logic) शांत न हो जाए तब तक वह आसानी से कुछ भी नहीं मान पाते हैं, एक तरह से देखा जाये तो यह बात सही भी है, होना भी यही चाहिए, उनके प्रश्नों के उत्तर तो उन्हें विस्तार में मिलने ही चाहिए तभी तो दिमाग विकसित हो पायेगा अन्यथा तो लकीर के फकीर ही बने रहेंगे सारी उम्र | इस किताब में भी इसी तरह का प्रयास किया गया है कि सब के तर्क यानी logic शांत हो सकें |

माँ अपने हर रूप में जो चीज़ें पकड़ी हैं, उनमें से एक छोटी सी चीज़ का उदाहरण लेते है, ताकि हम समझ सकें कि आगे इस किताब में किस तरह से उनकी हर एक चीज़ का मतलब बताया जा रहा है |

कमंडल :- कमंडल सन्यासी के पीने के पानी का पात्र तो है ही पर यहाँ माँ हमें उस कमंडल के पानी द्वारा जो ज्ञान देना चाह रही हैं वह इस प्रकार है –

पानी भरा कमंडल प्रतीक होता है दो बातों का, एक तो हमारे पास जितना भी हो हमें सदा उतने में ही संतुष्ट रहना चाहिए, दूसरा कमंडल का पानी पवित्रता का प्रतीक है, अर्थात यहाँ कमंडल के पानी की तुलना हमारे मन से की जा रही है | 

जिस तरह पानी की कमजोरी है कि उसके पवित्र होते हुए भी यदि हम उसे नियंत्रण में न रक्खें और उसको छोड़ दें तो वह सदैव नीचे से भी नीचे की दिशा ढूँढ कर उसी ओर बहना शुरू कर देता है और अपनी पवित्रता खो देता है , ठीक इसी प्रकार हमारा मन भी है, यदि हम अपनी इंद्रियों पर व मन पर अंकुश न लगायें उनको संयम या वश में न रखें, तो वह भी हमें गलत रास्ते की तरफ या पतन की ओर बड़ी आसानी से ले जा सकती है क्योंकि गलत चीज़ें व बुरी बातें बड़ी आसानी से अपनी ओर ध्यान खेच लेती हैं |

कमंडल के पानी की तुलना जो हमारे मन से हो रही है, यहाँ कमंडल हाथ में पकड़ने का मतलब है कि जिस तरह कमंडल का पानी कमंडल की सीमाओं में नियंत्रित होता है उसी तरह हमें अपने मन को भी अपने संयम से अपने वश में रखना चाहिए , तो यहाँ कमंडल प्रतीक है स्थिर चित्त का यानी strong mind का | strong mind क्या होता है यह देवी ब्रह्मचारिणी के chapter में विस्तार से बताया गया है | 


अब यह भी जानना जरूरी है कि इस किताब को लिखने की प्रेरणा मुझको क्यों, कैसे और कहाँ से मिली ,इसको लिखने का विचार कैसे आया ? माँ दुर्गा के नौ रूपों की ये सब paintings बनाते समय मुझे एक अलग सा अनुभव मिला और जो अनुभव मुझको मिला वह सिर्फ अपने तक ही सीमित रख पाना कठिन था इसलिए सोचा इसको आप सब के साथ इसको बाटूँ यानी share करूं |